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कबीर परमेश्वर एक अच्छे भगत के लक्षण बताते हुए कहते हैं

एक भक्त में एक शूरवीर जैसा गुण होना चाहिए क्योकि शूरवीर में एक विशेष गुण होता है कि वह न तो अन्याय को सहता है और न ही युध्द के मैदान में अपने कदम पीछे हटाता है । ऐसे ही हमे भी अपने परमात्मा पर दृढ विश्वास रखकर मर्यादा मे रहकर भक्ति बनाये रखना चाहिये।मालिक ने 2033 से 3032 तक का समय सिर्फ हमारे लिये नही बल्कि पूरे विश्व के जीवों को पार करने के लिये चुना है ।हममें इतनी बुद्धि नही कि हम मालिक के खेलो को समझ सके। कबीर साहेब को 52 बार मौत की सजा दी गयी और अन्त समय पर परमात्मा कबीर साहेब ने दिखाया कि अन्त भला तो सब भला।तुम अपने सब जन्त्र मन्त्र कर लो या जो सोचा हो वो कर लो जंजीर मे बांधों गंगा मे डुबोयो या जो कुछ तुमने विचारा हो वह कर लो पर परमात्मा ने सारी लीला कर हमे सिखाया अन्त भला तो सब भला अन्त मे जो तुम्हारे वश का है ही नही वह काम समर्थ समय आने पर करेगा।
कबीर सूरा के मैदान में
क्या कायर का काम।
कायर भागे पीठ देई
सूरा करे संग्राम॥
कबीर सूरा के मैदान में
कायर का क्या काम ।
सूरा सो सूरा मिलै
तब पूरा संग्राम ॥
कबीर परमेश्वर इन दोहों के माध्यम से सभी जीवो को समझाते हुए कहते हैं कि वीरो के युध्द क्षेत्र में कायरों का कोई काम नही होता।कायर तो युध्द छोड पीठ दिखाकर भाग जाता है । लेकिन शूरवीर निरंतर युध्द में डटा रहता है । और वो ही संग्राम को पूरा करते हैं ।
कबीर सूरा के मैदान में
कायर फंदा आये ।
ना भागे ना लडि सके
मन ही मन पछिताये ॥
कबीर साहेब इस दोहे के माध्यम से बताना चाहते हैं कि शूरवीर के मैदान में एक कायर फंस जाता है , उसे न तो भागते बनता है और न ही लडते बनता है । वह केवल मन ही मन पछताता रहता है ।
कबीर सूरा सोई जानिये
पांव न पीछे पेख ।
आगे चलि पीछा फिरै
ताका मुख नही देख ॥
परमात्मा कबीर साहेब हमें बताना चाहते हैं कि जो व्यक्ति पूर्ण संत से उपदेश लेकर भक्ति मार्ग में अपना कदम पीछे नही हटाता है यानि परमात्मा पर दृढ विश्वास रख मर्यादा मे रहकर अपनी भक्ति करता रहता है , वही सच्चा शूरवीर है ।
और जो इस राह में आगे चलकर पीछे मुड जाते हैं ऐसे भगत का कभी भी मुंह नहीं देखना चाहिए ।
इसी संदर्भ में परमात्मा कहते हैं -
कबीर जान बूझ साँचि तजै
करे झूठ से नेह।
ताकि संगत हे प्रभु
स्वप्न मे भी ना देह ॥
कबीर सूरा सोई सराहिये
लडै धनी के हेत ।
पुरजा पुरजा है गिरै
तौऊ ना छाडै खेत ॥
कबीर साहेब जी कहते हैं कि उस वीर ( शूरवीर ) की सराहना करें जो महान प्रभु ( पूर्ण परमेश्वर ) के लिए निरंतर संघर्ष - साधना करता है अर्थात् आन उपासना ना करके केवल एक ही पूर्ण परमात्मा की साधना पर विश्वास पूर्वक कायम रहता है । वह युध्द के मैदान ( सत् भक्ति मार्ग ) को कभी नही छोडता है भले ही उसके टुकडे - टुकडे हो जायें यानि दुनिया उसे कुछ भी कहे वह अपने भगति के मार्ग से डगमग नही होता विचलित नही होता।वह सर्वस्व त्याग के बाबजूद अपनी सत् साधना पथ पर अडिग रहता है ।
इसी प्रकार कबीर साहेब हम सभी जीवो को बता रहे हैं कि भक्त को चाहिए कि भक्ति - साधना तथा मर्यादा का पालन अन्तिम श्वांस तक करना चाहिए । जैसे शूरवीर युध्द के मैदान में या तो मार देता है या स्वयं वीरगति को प्राप्त हो जाता है , वह कदम पीछे नही हटाता इसी प्रकार संत तथा भक्ति का रणक्षेत्र है *मंत्र का विश्वास पूर्वक जाप तथा मर्यादा*। और जो शिष्य गुरू से विमुख होकर भक्ति छोड देता है तो उसको बहुत हानि होती है ।
परमात्मा कहते हैं-
कबीर सत् ना छोडे सूरमा
सत् छोडे पत जाये ।
सत् के बाँधे लक्ष्मी
फेर मिलेगी आय ॥
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