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‘‘रंका-बंका की झोपड़ी में जब लगी आग ’’

बेटी अवंका झोंपड़ी के बाहर एक चारपाई पर बैठी थी। अचानक झोंपड़ी में आग लग गई। सर्व सामान जलकर राख हो गया। रंका तथा बंका दोनों पति-पत्नी गुरू जी (कबीर साहेब जी) के सत्संग में गए हुए थे जो कुछ दूरी पर किसी भक्त के घर पर चल रहा था। 

अवंका दौड़ी-दौड़ी सत्संग में गई। गुरू जी प्रवचन कर रहे थे। अवंका ने कहा कि माँ! झोंपड़ी में आग लग गई। सब जलकर राख हो गया। सब श्रोताओं का ध्यान अवंका की बातों की ओर गया। माँ बंका जी ने पूछा कि बेटी क्या बचा है? अवंका ने बताया कि केवल एक खटिया बची है जिस पर मैं बाहर बैठी थी। माँ बंका ने कहा कि बेटी जा, उस खाट को भी उसी आग में डाल दे और आकर सत्संग सुन ले। कुछ जलने को रहेगा ही नहीं तो सत्संग में भंग ही नहीं पड़ेगा। बेटी सत्संग हमारा धन है। यदि यह जल गया तो अपना सर्वनाश हो जाएगा। लड़की वापिस गई और उस चारपाई को उठाया और उसी झोंपड़ी की आग में डालकर आ गई और सत्संग में बैठ गई। सत्संग के पश्चात् अपने ठिकाने पर गए। वहाँ एक वृक्ष था। उसके नीचे वह सामान जो जला नहीं था जैसे बर्तन, घड़ा आदि-आदि पड़े थे। उस वृक्ष के नीचे बैठकर भजन करने लगे। उनको पता नहीं चला कि कब सो गये? सुबह जागे तो उस स्थान पर नई झोंपड़ी बनी हुई थी। सर्व सामान रखा था। आकाशवाणी हुई कि हे भक्तों! आप परीक्षा में सफल हुए। यह भेंट मेरी ओर से है, इसे स्वीकार करो। तीनों सदस्य उठकर पहले आश्रम में गए और झोंपड़ी जलने तथा पुनः बनने की घटना बताई । गुरू जी रूप में बैठे परमात्मा ने कहा कि आपकी आस्था परमात्मा में बनाए रखने के लिए अनहोनी की है। आग भी मैंने लगाई थी, आपका दृढ़ निश्चय देखकर झोंपड़ी भी मैंने बनाई है। आप उसे स्वीकार करें। परमात्मा की महिमा भक्त समाज में बनाए रखने के लिए ये परिचय (चमत्कार देकर परमात्मा की पहचान) देना अनिवार्य है। आपकी झोंपड़ी जीर्ण-शीर्ण थी। आप भक्ति में भंग होने के भय से नई बनाने में समय व्यर्थ करना नहीं चाहते थे। मैं आपके लिए पक्का मकान भी बना सकता हूँ। स्वर्ण का भी बना सकता हूँ क्योंकि आप प्रत्येक परीक्षा में सफल रहे हो। उस दिन रास्ते में धन मैंने ही डाला था। नामदेव मेरे साथ था। आप उस कुटी में रहें और परमात्मा की भक्ति करें। रंका-बंका ने उस मर्यादा का पालन किया :- 

कबीर, गुरू गोविंद दोनों खड़े, किसके लागूं पाय। 
बलिहारी गुरू आपणा, गोविन्द दियो बताय।। 

आकाशवाणी को परमात्मा की आज्ञा माना, परंतु गुरू जी के पास आकर गुरू जी की क्या आज्ञा है? यह गुरू पर बलिहारी होना है। गोविन्द (प्रभु) की आज्ञा स्वीकार्य नहीं हुई। गुरू की आज्ञा का पालन करके यहाँ भी परीक्षा में खरे उतरे। उस गाँव के व्यक्तियों ने भक्त रंका की कुटिया जलती तथा जलकर राख हुई देखी थी। सुबह नई और बड़ी जिसमें दो कक्ष थे, बनी देखी तो पूरा गाँव देखने आया। आसपास के क्षेत्र के स्त्री-पुरूष भी देखने आए। रंका-बंका की महिमा हुई तथा उनके गुरू जी की शरण में बहुत सारे गाँव तथा आसपास के व्यक्ति आए और अपना कल्याण करवाया।

परमात्मा सर्व सुख दाता है। सर्व संकट मोचनहार है। निर्धन को धन, बांझ को पुत्र, कोढ़ी को सुन्दर काया, अन्धे को आँख, बहरे को कान, गूंगे को जुबान परमात्मा प्रदान कर देता है।

गरीब भक्ति बिन क्या होत है, भ्रम रहा संसार।
 रति कंचन पाया नहीं, रावण चलती बार।।

यदि साधक को परमात्मा पर विश्वास ही नहीं है तो नाम-सुमरण का कोई लाभ नहीं। उसके मानव जीवन को काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार रूपी पाँच चोर मुस (चुरा) रहे हैं। जिन-जिन भक्तों ने मर्यादा में रहकर जिस स्तर की भक्ति की है उनको लाभ अवश्य मिलता है। इसी प्रकार आप भी तन-मन-धन समर्पित करके तत्वदर्शी गुरू धारण करके आजीवन भक्ति मर्यादा में रहकर करोगे तो आप भी भक्ति की शक्ति प्राप्त करके अमर हो जाओगे।

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