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"जब राजा वाजीद का ऊंट चलते-चलते मर गया"

कथा :- एक वाजीद नाम का मुसलमान राजा था। एक समय अपनी राजधानी से अन्य शहर में जा रहा था। रेगिस्तानी क्षेत्र था। पहले ऊँटों पर चलते थे। सैंकड़ों अंगरक्षक भी साथ थे। मंत्री तथा प्रधानमंत्री, धर्मगुरू तथा वैद्य भी साथ चले। सब ऊँटों पर चढ़कर चल रहे थे। आगे पर्वतों के बीच से घाटी से होकर जा रहे थे। ऊँट एक के पीछे एक चल रहे थे। वह घाटी इतनी तंग थी कि एक समय में वहां एक ऊँट ही चल सकता था। उस घाटी में एक ऊँट गिर गया और गिरते ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। राजा का काफिला रूक गया क्योंकि बराबर से निकलने का स्थान नहीं था। आगे ऊँटों की लंबी पंक्ति थी। घाटी की लंबाई भी तीन-चार किलोमीटर थी। यह घटना बीच में हो गई। राजा ने कहा कि मेरी आज्ञा बिना काफिला किसने रूकवाया है? उसे बुलाओ। मंत्रीगण गए और आकर कारण बताया। राजा वाजीद ने कहा कि मुझे दिखाओ, मेरी आज्ञा के बिना ऊँट कैसे मर गया और कैसे लेट गया? राजा ने देखा कि आँख ठीक, नाक ठीक, कान, टाँग, दुम, गर्दन सब ठीक है। फिर कहाँ से मर गया? धर्म पीर (गुरू) ने बताया कि हे राजन! जिस प्राणी का जितना समय परमात्मा ने निर्धारित कर रखा है, वह उतने समय तक ही संसार में रहता है। चाहे मानव है या अन्य प्राणी। वाजीद बादशाह ने गुरू जी से प्रश्न किया कि क्या मैं भी मरूँगा? गुरू जी ने कहा, जी! आप भी मरोगे। आपके दादा-परदादा भी राजा थे। वे भी मर गए। एक दिन सबको संसार छोड़कर जाना है। राजा वाजीद ने कहा कि," पीछे चलो। काफिला पहले आगे गया। मृत ऊँट को उठाकर घसीटकर ले चले। फिर वापिस राजधानी को चले। राजा ने पूछा कि, हे पीर (गुरू) जी! फिर मानव जीवन का क्या लाभ है? गुरू जी ने बताया कि भगवान की भक्ति करके अमर हुआ जा सकता है। राजा ने घर आते ही राजशाही वस्त्र त्याग दिये। घर त्यागकर चल पड़ा। उसकी कई स्त्रियाँ (रानियाँ) थी। वे सभी रोने लगीं। हमारा क्या होगा? आप हमारे भरतार (पति) हैं। वाजीद ने कहा, यह संसार तो डूबन केसा गारा (दलदल) है। मैंने अमर होना है। मैं चला, मैं मानने वाला नहीं हूँ।

श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में , गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि हे अर्जुन! तू सर्वभाव से उस परमेश्वर की शरण में जा, उस परमेश्वर की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम (शाश्वतम् स्थानम्) को प्राप्त होगा। गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि तत्त्वज्ञान प्राप्ति के पश्चात् परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक लौटकर कभी संसार में नहीं आता। जिस परमेश्वर ने संसार रूपी वृक्ष की रचना की है, उसी की भक्ति करो।

काल के भयंकर 84 लाख योनियों में जन्म मृत्यु के जाल से बचने का केवल एक ही रास्ता है वह है सतभक्ति करके मोक्ष पाना और जन्म मृत्यु से सदा के लिए पीछा छुड़ाना।

(अधिक जानकारी के लिए पढ़ें पुस्तक ज्ञान गंगा)

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